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Supreme court: जेलों में भेदभाव पर सुप्रीम कोर्ट ने जतायी चिंता, बोला-यह दुर्भाग्यपूर्ण और ‘बहुत दुखद’ है

New Delhi. उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण और ‘बहुत दुखद’ है कि 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने जेलों के भीतर भेदभाव से जुड़े एक मामले में केंद्र द्वारा मांगी गई जानकारी अभी तक उपलब्ध नहीं कराई है। अक्टूबर 2024 में दिए गए एक ऐतिहासिक फैसले में, न्यायालय ने जेलों में शारीरिक श्रम का बंटवारा, बैरकों को अलग-अलग रखना तथा विमुक्त जातियों और आदतन अपराधियों के प्रति जाति-आधारित भेदभाव पर रोक लगा दी थी। शीर्ष अदालत ने 10 राज्यों की जेल नियमावली के उन नियमों को ‘असंवैधानिक’’ करार दिया था, जो इस तरह के भेदभाव को बढ़ावा देते थे। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनमोहन की एक पीठ, जो मंगलवार को ‘भारत की जेलों में भेदभाव’ शीर्षक वाले एक स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई कर रही थी, ने इस बात पर गौर किया कि केंद्र ने इस मामले में हुई आगे की प्रगति को दर्शाते हुए एक नयी वस्तु स्थिति रिपोर्ट दाखिल की है।

पीठ ने कहा कि इस रिपोर्ट में मध्य प्रदेश पुलिस विनियमन, 1937 के समान पुलिस नियमों और ‘मॉडल कारागार नियमावली, 2016 के तहत गठित जिला-स्तरीय निरीक्षक मंडल से जुड़े मुद्दों को उजागर किया गया है। मंगलवार को मामले की सुनवाई करते हुए, पीठ ने कहा कि रिपोर्ट से पता चलता है कि संबंधित मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के अतिरिक्त मुख्य सचिवों/प्रधान सचिवों (गृह)/गृह सचिवों और पुलिस महानिदेशकों(डीजीपी)/पुलिस प्रमुखों को पत्र भेजे थे। पीठ ने कहा, ‘दुर्भाग्य से, 23 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों ने अभी तक केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा मांगी गई जानकारी का जवाब नहीं दिया है।’’

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