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लोकसभा का मॉनसून सत्र में 12 विधेयक पारित, अनिश्चितकाल के लिए सत्र स्थगित

नई दिल्ली. लोकसभा का मॉनसून सत्र गुरुवार को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया. इस सत्र में 12 विधेयकों को बिना चर्चा या संक्षिप्त चर्चा के साथ पारित किया गया. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने विपक्षी दलों के रवैये पर निराशा जताते हुए कहा कि उन्होंने नियोजित तरीके से सदन की कार्यवाही में व्यवधान डाला, जो लोकतंत्र और सदन की गरिमा के खिलाफ है.

सत्र के आखिरी दिन सुबह 11 बजे प्रश्नकाल शुरू होते ही विपक्षी सदस्यों ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के मुद्दे पर नारेबाजी शुरू कर दी. हंगामे के कारण लोकसभा अध्यक्ष ने कार्यवाही दोपहर 12 बजे तक स्थगित कर दी. सत्र की शुरुआत 21 जुलाई को हुई थी, जिसमें 14 सरकारी विधेयक पेश किए गए और 12 पारित हुए.

पारित प्रमुख विधेयक

पारित विधेयकों में गोवा विधेयक 2025, मर्चेंट शिपिंग विधेयक 2025, मणिपुर वस्तु एवं सेवा कर (संशोधन) विधेयक 2025, राष्ट्रीय खेल प्रशासन विधेयक 2025, आयकर विधेयक 2025, भारतीय बंदरगाह विधेयक 2025, और ऑनलाइन खेल संवर्धन और विनियमन विधेयक 2025 शामिल हैं. कुछ विधेयक हंगामे के बीच बिना चर्चा के पारित हुए.

विपक्ष और सत्तापक्ष में तनातनी

तीन विधेयकों—संविधान (130वां संशोधन) विधेयक 2025, संघ राज्य क्षेत्र शासन (संशोधन) विधेयक 2025, और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक 2025—को संसद की संयुक्त समिति को भेजा गया. इन विधेयकों को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पेश किया था, जिस दौरान सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली.

सत्र में चर्चा पर असर

लोकसभा अध्यक्ष ने बताया कि सत्र के लिए 419 तारांकित प्रश्न सूचीबद्ध थे, लेकिन विपक्ष के हंगामे के कारण केवल 55 प्रश्नों का मौखिक जवाब दिया जा सका. सत्र में 120 घंटे चर्चा की योजना थी, लेकिन केवल 37 घंटे ही चर्चा हो पाई. 28 और 29 जुलाई को ऑपरेशन सिंदूर पर विशेष चर्चा बिना व्यवधान के हुई, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जवाब दिया. हालांकि, 18 अगस्त को भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम पर चर्चा हंगामे के कारण पूरी नहीं हो सकी.

लोकसभा अध्यक्ष ने जताई नाराजगी

ओम बिरला ने विपक्ष के व्यवहार पर नाराजगी जताते हुए कहा कि जनता सांसदों से उनकी समस्याओं पर सार्थक चर्चा की उम्मीद करती है. उन्होंने कहा, “सदन में नारेबाजी, तख्तियां लाना और अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल संसद की परंपराओं के खिलाफ है.” उन्होंने विपक्ष से सदन की गरिमा बनाए रखने की अपील की.

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