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Jagarnath Mandir Controversy : दीघा मंदिर की मूर्तियां बनाने में पुरी मंदिर की पवित्र लकड़ी के ”उपयोग” को लेकर सेवादार को नोटिस

Bhuvaneshvar. पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (एसजेटीए) ने पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल के दीघा में स्थित एक मंदिर में मूर्तियां बनाने में 12वीं सदी के मंदिर की अतिरिक्त पवित्र लकड़ी के कथित इस्तेमाल को लेकर एक वरिष्ठ सेवादार को कारण बताओ नोटिस जारी किया है. यह जानकारी अधिकारियों ने दी. प्रशासन की ओर से जारी एक बयान में कहा गया कि दैतापति निजोग के सचिव और वरिष्ठ सेवादार रामकृष्ण दासमहापात्र को इस आरोप में नोटिस जारी किया गया है कि उनके विरोधाभासी बयानों से भगवान जगन्नाथ के अनेक श्रद्धालुओं और उपासकों के मन में भ्रम उत्पन्न हुआ” और मंदिर की “गरिमा को ठेस पहुंची. ‘दैतापति नियोग’ सेवादारों का एक समूह है, जिन्हें भगवान जगन्नाथ का अंगरक्षक माना जाता है.

दासमहापात्र को 4 मई से सात दिनों के भीतर अपना जवाब देने को कहा गया है. नोटिस में कहा गया है, ‘‘यदि इस समयावधि में संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं मिला तो श्री जगन्नाथ मंदिर अधिनियम, 1955 के अनुसार कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी. दासमहापात्र ने तीस अप्रैल को पुरी के 55 अन्य सेवादारों के साथ दीघा मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह में भाग लिया था. उक्त समारोह में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी उपस्थित थीं.

दासमहापात्र ने कथित तौर पर ‘दारू गृह’ (भंडार कक्ष) में संग्रहित पुरी मंदिर की पवित्र लकड़ी का उपयोग दीघा मंदिर के लिए भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां बनाने के लिए किया था तथा मूर्तियों को प्राणप्रतिष्ठा के लिए दीघा मंदिर ले गए थे. नोटिस में यह भी उल्लेख किया गया है कि दासमहापात्र ने एक बांग्ला समाचार चैनल के साथ साक्षात्कार में स्वीकार किया था कि उन्होंने पुरी मंदिर की पवित्र लकड़ी का उपयोग दीघा मंदिर की मूर्तियां बनाने के लिए किया था और बाद में उन्होंने ओडिशा मीडिया में इसका खंडन किया था. नोटिस में कहा गया है कि दासमहापात्र ने दावा किया था कि उन्होंने मूर्तियां बनाने के लिए एक अन्य नीम के पेड़ का उपयोग किया था.

एसजेटीए ने वरिष्ठ सेवादार के कृत्य पर चिंता व्यक्त की, जिनके पास ‘दैतापति नियोग’ के सचिव का भी प्रभार है. पुरी के मंदिर की परंपरा के अनुसार, ‘नवकलेवर’ उत्सव के बाद बची हुई लकड़ी को एक कमरे में संग्रहित कर लिया जाता है और आवश्यकता पड़ने पर मूर्तियों की मरम्मत के लिए उपयोग किया जाता है.

एक पुजारी ने बताया कि कई धार्मिक गतिविधियों के बाद होने वाले ‘बनजोग’ अनुष्ठान के दौरान राज्य भर के विभिन्न स्थानों से लकड़ियां एकत्र की जाती हैं. उन्होंने बताया कि इसलिए, ‘नवकलेवर’ के दौरान एकत्र की गई लकड़ी को पवित्र और दुर्लभ माना जाता है. अधिकारियों ने कहा कि दासमहापात्र के विरोधाभासी बयान से श्रद्धालुओं में नाराजगी उत्पन्न हुई है क्योंकि उनकी टिप्पणी से “उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं.

पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा दीघा मंदिर को ‘जगन्नाथ धाम’ के रूप में चित्रित करने और वहां मूर्तियों के निर्माण में पुरी मंदिर की अतिरिक्त लकड़ी के कथित इस्तेमाल को लेकर विवाद के बीच, ओडिशा के कानून मंत्री पृथ्वीराज हरिचंदन ने 2 मई को एसजेटीए से मामले की जांच करने को कहा था. एसजेटीए के मुख्य प्रशासक अरबिंद पाधी ने रविवार को दासमहापात्र को तलब किया था और उनसे करीब 90 मिनट तक पूछताछ की थी.

अधिकारियों ने बताया कि प्रशासन यह जानना चाहता है कि क्या उन्होंने ‘दैतापति नियोग’ के सचिव के तौर पर पुरी मंदिर से पवित्र लकड़ी ली थी और उसका इस्तेमाल दीघा मंदिर के लिए मूर्तियां बनाने में किया था?.

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