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Jamshedpur News :दबिस्तान-ए-जमशेदपुर की संगोष्ठी में डॉ. बशीर बद्र को श्रद्धांजलि, शायरी और व्यक्तित्व पर हुई चर्चा

जमशेदपुर, । साहित्यिक संस्था ‘दबिस्तान-ए-जमशेदपुर’ के तत्वावधान में प्रसिद्ध उर्दू शायर डॉ. बशीर बद्र की स्मृति में जवाहर नगर में एक श्रद्धांजलि संगोष्ठी का आयोजन किया गया। गौरतलब है कि उर्दू अदब की दुनिया के मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र का निधन 28 मई 2026 को हो गया था। उनकी याद में आयोजित इस कार्यक्रम में शहर के साहित्यकारों, शायरों और उर्दू प्रेमियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया।

कुरान की तिलावत से हुआ कार्यक्रम का आगाज

संगोष्ठी की शुरुआत मस्जिदे कमरुद्दीन के इमाम मुफ्ती अब्दुल रऊफ कासमी द्वारा पवित्र कुरान की तिलावत से हुई। इसके बाद शायर सफीउल्लाह सफी ने तरन्नुम में और शोएब अख्तर ने अपने खास अंदाज में डॉ. बशीर बद्र की मशहूर गजलों का पाठ कर उपस्थित लोगों को भावुक कर दिया।

साहित्यकारों ने रखे अपने विचार

कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ शायर अहमद बद्र ने की। मुख्य अतिथि के रूप में करीम सिटी कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. यहिया इब्राहीम तथा वरिष्ठ शायर अनवर अदीब उपस्थित रहे। संस्था के सरपरस्त प्रो. गौहर अजीज ने स्वागत भाषण देते हुए बशीर बद्र की साहित्यिक सेवाओं को याद किया।

संगोष्ठी में हस्साम गनी, फरहान खान फरहान, सकलैन मुश्ताक, प्रो. गौहर अजीज, डॉ. यहिया इब्राहीम और अनवर अदीब सहित कई वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने डॉ. बशीर बद्र के जीवन, उनकी शायरी की विशिष्टताओं और उर्दू साहित्य में उनके योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला।

‘वे सिर्फ उर्दू नहीं, पूरे हिन्दुस्तान के शायर थे’

अपने अध्यक्षीय संबोधन में अहमद बद्र ने कहा कि डॉ. बशीर बद्र एक ऐसे शायर थे जिन्होंने अपनी गजलों के माध्यम से लाखों दिलों में जगह बनाई। उन्होंने कहा कि बशीर बद्र केवल उर्दू भाषा के शायर नहीं थे, बल्कि पूरे हिन्दुस्तान के शायर थे। उनकी शायरी आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करती रहेगी और वे अपनी रचनाओं के जरिए हमेशा जीवित रहेंगे।

सामूहिक दुआ के साथ हुआ समापन

कार्यक्रम के अंत में अब्दुल्लाह कासमी की अगुवाई में डॉ. बशीर बद्र की मगफिरत और उच्च स्थान के लिए सामूहिक दुआ की गई। कार्यक्रम का संचालन शायर सद्दाम गनी ने किया, जबकि संस्था के सचिव फरहान अख्तर फरहान ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और उपस्थित साहित्य प्रेमियों का धन्यवाद ज्ञापित किया।

यह संगोष्ठी न केवल डॉ. बशीर बद्र को श्रद्धांजलि देने का माध्यम बनी, बल्कि उनकी साहित्यिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का भी एक सार्थक प्रयास साबित हुई।

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