
Ranchi. झारखंड करीब 45,000 हेक्टेयर खनन भूमि का पुन: उपयोग करके, पारंपरिक ऊर्जा संपत्तियों का लाभ उठाकर और कम कार्बन उत्सर्जन वाले औद्योगिक मार्गों को बढ़ावा देकर भारत के शुद्ध शून्य लक्ष्य की ओर अग्रसर होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. दिल्ली स्थित शोध संस्थान ‘इंटरनेशनल फोरम फॉर एनवायरनमेंट, सस्टेनेबिलिटी एंड टेक्नोलॉजी’ (आईफॉरेस्ट) द्वारा किए गए अध्ययन में कोयला खनन एवं बिजली, इस्पात, मोटर वाहन तथा अन्य प्रमुख उद्योगों में राज्य के परिवर्तन की संभावनाओं का व्यापक आकलन प्रस्तुत किया गया है.
इसमें कहा गया है, बंद एवं गैर-संचालित कोयला खदानों से 11,000 हेक्टेयर से अधिक भूमि तुरंत उपलब्ध है. कुल मिलाकर, अगले पांच से 10 वर्ष में करीब 45,000 हेक्टेयर भूमि के पुनः उपयोग की योजना बनाई जा सकती है. इससे नवीकरणीय ऊर्जा, हरित विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स एवं संबंधित गतिविधियों जैसे हरित निवेश के लिए खनन भूमि के पुनः उपयोग का बड़ा अवसर मिलेगा जो कोयला-निर्भर जिलों में आर्थिक विविधीकरण और रोजगार सृजन को समर्थन देगा.
अध्ययन के अनुसार, जिला खनिज फाउंडेशन (डीएमएफ) में संचय के रूप में 16,977 करोड़ रुपये की राशि के साथ झारखंड के पास कोयला बहुल जिलों में आजीविका विविधीकरण, कौशल विकास एवं अन्य कल्याणकारी गतिविधियों सहित संतुलित बदलाव के अनुरूप निवेश को प्रारंभिक चरणों में वित्तपोषित करने का एक बड़ा अवसर है.
अध्ययन में भारत के निम्न-कार्बन विकास मार्ग में राज्य के रणनीतिक महत्व को रेखांकित किया गया। साथ ही इसमें कहा गया कि यदि समय रहते योजना बनाई जाए तो कोयला परिवर्तन हरित निवेश और रोजगार सृजन के लिए एक बड़ा अवसर साबित हो सकता है.
