
New Delhi. सरकार आने वाले वर्ष में इस्पात उत्पादन बढ़ाने और कच्चे माल की सुरक्षा को प्राथमिकता देती रहेगी, क्योंकि भारत 2030 तक 30 करोड़ टन की स्थापित इस्पात विनिर्माण क्षमता हासिल करने के अंतिम पांच वर्षों में प्रवेश कर चुका है. क्षमता विस्तार के साथ ही कम कार्बन उत्सर्जन वाली प्रौद्योगिकियों को अपनाने, हरित इस्पात क्षमता को बढाने और घरेलू उद्योगों तथा निर्यात बाजारों की बदलती जरूरतों को पूरा करने के लिए विशेष और उच्च-स्तरीय इस्पात के उत्पादन पर जोर बना रहेगा.
इस्पात मंत्रालय के एक अधिकारी ने यह जानकारी दी.
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कच्चा इस्पात उत्पादक है और सरकार की विभिन्न नीतियों के कारण इस्पात की मांग को लगातार समर्थन मिल रहा है. हालांकि उद्योग के सामने चुनौतियां भी हैं, जिनमें बढ़ता आयात, कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक व्यापार अनिश्चितताएं शामिल हैं। पहले से लागू सुरक्षा और एंटी-डंपिंग उपायों के बावजूद एशियाई बाजारों से आयात, घरेलू उत्पादकों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है.
सरकार ने मई 2017 में महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय इस्पात नीति पेश की थी, जिसका लक्ष्य लगभग 10 लाख करोड़ रुपये के अनुमानित निवेश के साथ 20 करोड़ टन से अधिक इस्पात निर्माण क्षमता जोड़ना है. इस्पात मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि सरकार ने घरेलू उद्योग की सुरक्षा के लिए कई कदम उठाए हैं, जिनमें चीन और वियतनाम जैसे देशों से फ्लैट इस्पात उत्पादों के आयात पर सुरक्षा शुल्क और एंटी-डंपिंग शुल्क लगाना शामिल है.
जिंदल स्टील के चेयरमैन और भारतीय इस्पात संघ के अध्यक्ष नवीन जिंदल ने कहा कि भारत ने अच्छी प्रगति की है, लेकिन इसे और तेजी से लागू करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आगे का मार्ग निरंतर मांग सृजन, नीतिगत स्थिरता और साहसिक निवेश की मांग करता है.
