Mumbai.वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को कहा कि टाटा संस और उसके सबसे बड़े शेयरधारक टाटा ट्रस्ट के बीच जारी मतभेदों को जल्द से जल्द आपसी सहमति से सुलझाया जाना चाहिए। विदेशी निवेशकों की ओर से पूंजी निकासी और करों में कटौती की बढ़ती मांग के बीच सीतारमण ने इन मुद्दों पर कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं की। हालांकि, उन्होंने कहा कि वह चिंताएं जताने वाली मुखर आवाजों के प्रति संवेदनशील हैं। टाटा समूह के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और इसे सार्वजनिक मंच पर नहीं आना चाहिए।

हालांकि, उन्होंने इस बारे में कुछ कहने से इनकार कर दिया कि क्या सरकार दोनों पक्षों को बातचीत के लिए साथ लाने का प्रयास करेगी। उन्होंने इस मामले को संवेदनशील बताया। सीतारमण ने कहा, यह भारतीय अर्थव्यवस्था का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए दोनों पक्षों को आपसी सहमति से इस मुद्दे को सुलझाना चाहिए और बातचीत के जरिये जल्द से जल्द सामान्य स्थिति बहाल करनी चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘‘यह मामला इस तरह सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आना चाहिए। नेतृत्व से परिपक्वता की उम्मीद करते हुए हम चाहते हैं कि इसका जल्द समाधान हो। इस मुद्दे को संवेदनशील बताते हुए सीतारमण ने कहा कि इसे सुलझाने के लिए व्यावसायिक समझ और सभी संबंधित पक्षों के बीच सौहार्द जरूरी है।

उन्होंने उम्मीद जताई कि समूह का नेतृत्व जल्द मतभेद दूर कर सामान्य स्थिति बहाल करेगा। वित्त मंत्री ने पारसी समुदाय के योगदान को भी स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि इस समुदाय के योगदान से टाटा एक वैश्विक ब्रांड बना और समूह ने विभिन्न क्षेत्रों में अपना कारोबार फैलाया।
टाटा समूह में पिछले कुछ माह से मतभेद बने हुए हैं। यह विवाद 17 सितंबर को टाटा संस के निदेशक मंडल की बैठक में खुलकर सामने आया, जब एन चंद्रशेखरन के नेतृत्व वाले टाटा संस के निदेशक मंडल और उसके सबसे बड़े शेयरधारक नोएल टाटा की अगुवाई वाले टाटा ट्रस्ट के बीच मतभेद खुलकर सामने आए।
यह बैठक भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का वह पत्र मिलने के एक सप्ताह के भीतर हुई थी, जिसमें उसने टाटा संस की मुख्य निवेश कंपनी के रूप में पंजीकरण रद्द करने की मांग ठुकरा दी थी। बैठक में आरबीआई के निर्देश के अनुसार कंपनी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराने का फैसला किया गया। साथ ही, चंद्रशेखरन को टाटा संस के चेयरमैन के रूप में फिर नियुक्त किया गया।
बैठक में नोएल टाटा ने अकेले इस फैसले का विरोध किया था। वहीं, टाटा ट्रस्ट के दूसरे नामित निदेशक वेणु श्रीनिवासन ने उनका साथ देने के बजाय बहुमत के पक्ष में मतदान किया था।

