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Tata Sons और Tata Trust आमने-सामने, पैरवी के लिए नियुक्त वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी बोले-दोनों के बीच के संबंध को तोड़ना और एक-दूसरे से अलग करना अकल्पनीय

New Delhi.  टाटा ट्रस्ट की ओर से पैरवी के लिए नियुक्त वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने रविवार को कहा कि वह ‘‘दुख और अफसोस’’ के साथ इस मामले में उतर रहे हैं क्योंकि इन मुद्दों का सौहार्दपूर्ण समाधान नहीं हो सका। सिंघवी ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि शेयरधारक-मालिकों के मौलिक अधिकारों को उस तरीके से समाप्त नहीं किया जा सकता, जिस तरह से किया गया है। सिंघवी ने कहा, ‘रतन टाटा के साथ पहले करीबी रूप से काम करने, उनकी विरासत को जानने, मौजूदा तथाकथित टाटा विवाद में दोनों पक्षों के सभी प्रमुख पक्षकारों को व्यक्तिगत रूप से जानने के साथ-साथ उन सभी के प्रति गहरा, वास्तविक और स्थायी सम्मान रखने तथा उनके साथ अच्छे संबंध होने के कारण, एक पक्ष के प्रमुख वकील के रूप में इस मामले में उतरते समय मेरी पहली प्रतिक्रिया दुख और अफसोस की है कि इन मुद्दों का सौहार्दपूर्ण समाधान नहीं हो सका।

टाटा संस के निदेशक मंडल ने नटराजन चंद्रशेखरन के कार्यकाल को पांच साल बढ़ाने का समर्थन किया है। इस फैसले का नोएल टाटा ने विरोध किया और ट्रस्ट ने इसकी वैधता को चुनौती दी है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा कंपनी के उच्च-स्तरीय गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) के रूप में अपना पंजीकरण वापस लेने के आवेदन को खारिज किए जाने के बाद टाटा संस के निदेशक मंडल ने कंपनी को सार्वजनिक सूचीबद्धता (लिस्टिंग) की दिशा में आगे बढ़ाने का समर्थन किया है।

टाटा संस में सामूहिक रूप से करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट ने लिस्टिंग का विरोध किया है। ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा ने कंपनी से अन्य विकल्पों पर विचार करने का आग्रह किया है। सिंघवी ने कहा कि शेयरधारक-मालिकाना अधिकारों को कमजोर करना भारत की सैकड़ों कंपनियों में कॉरपोरेट प्रशासन के लिए विनाशकारी साबित होगा। उन्होंने कहा कि टाटा ट्रस्ट में लोकतांत्रिक तरीके से होने वाली आंतरिक निर्णय प्रक्रिया को बैठक बुलाने पर अचानक और पूरी तरह अनुचित रोक लगाकर बाधित करना अलग मामला है, जिसकी वैधता पर गंभीर सवाल उठते हैं।

सिंघवी ने कहा, ‘टाटा ट्रस्ट और टाटा संस के बीच सौ साल से अधिक समय से चले आ रहे स्थापित संबंध को तोड़ना और दोनों को एक-दूसरे से अलग करना अकल्पनीय लगता है। उन्होंने कहा कि आपसी सहयोग और सौहार्द के अभाव में ये तथा इससे जुड़े कई अन्य मुद्दे दुर्भाग्यवश केवल कानूनी समाधान के जरिए ही सुलझाए जा सकते हैं।

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