Site icon Lahar Chakra

Tata Sons Controversy: टाटा संस को शोयर बाजार सूचीबद्ध होने के निर्देश के बाद आरबीआई ने हाइकोर्ट में दाखिल की कैविएट, जानें क्या है मामला?

Mumbai. टाटा संस के गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) के पंजीकरण को वापस करने के आवेदन को खारिज करने के बाद भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने इस संबंध में बंबई उच्च न्यायालय में एक कैविएट दाखिल की है। सूत्रों ने सोमवार को बताया कि इस उच्चस्तरीय कानूनी लड़ाई में कोई भी न्यायिक आदेश पारित होने से पहले अपना पक्ष सुना जाना सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय बैंक ने यह कदम उठाया है। आरबीआई ने टाटा संस के मार्च, 2024 के आवेदन को खारिज कर दिया था, जिसके बाद इस होल्डिंग कंपनी के लिए शेयर बाजारों में सूचीबद्ध होना अनिवार्य हो गया है। हालांकि, इसमें दो-तिहाई से अधिक हिस्सेदारी रखने वाले सबसे बड़े शेयरधारक टाटा ट्रस्ट्स सहित कई पक्ष सूचीबद्धता को लेकर अनिच्छुक हैं।

यदि कोई भी याचिकाकर्ता अदालत का रुख करता है, तो यह कैविएट सुनिश्चित करेगी कि अदालत द्वारा कोई भी आदेश पारित करने से पहले केंद्रीय बैंक का पक्ष अनिवार्य रूप से सुना जाए। संपर्क किए जाने पर न तो आरबीआई और न ही टाटा संस की ओर से कोई प्रतिक्रिया मिली।

टाटा संस के निदेशक मंडल की बैठक निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार बृहस्पतिवार को होने की उम्मीद है। सूत्रों ने कहा कि आरबीआई के आदेश को किसी भी प्रकार की कानूनी चुनौती बोर्ड की बैठक के बाद ही दी जा सकती है। केंद्रीय बैंक ने टाटा संस की याचिका खारिज कर महीनों से जारी संशय को समाप्त कर दिया है, जिसके बाद इसे ‘अपर-लेयर’ एनबीएफसी के रूप में वर्गीकृत किया गया है और इसका सूचीबद्ध होना अनिवार्य हो गया है।

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब 170 अरब डॉलर मूल्य की टाटा संस पहले से ही नेतृत्व की चुनौतियों और विभाजित बोर्ड का सामना कर रही है। इसी गतिरोध के कारण चेयरमैन एन चंद्रशेखरन ने अगले साल फरवरी में अपना कार्यकाल समाप्त होने पर पुनर्नियुक्ति की दौड़ से बाहर रहने का विकल्प चुना है। शेयरधारकों के बीच भी मतभेद साफ दिख रहे हैं। नोएल टाटा के नेतृत्व वाला टाटा ट्रस्ट्स (गैर-लाभकारी संस्थाओं का समूह जिसके पास टाटा संस की 65 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी है) सूचीबद्धता के पक्ष में नहीं है, जबकि लगभग 18 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाला इसका सबसे बड़ा निजी शेयरधारक शापूरजी पालोनजी समूह सार्वजनिक रूप से सूचीबद्धता की मांग कर रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, सूचीबद्धता से समूह को पूंजी आवंटन सहित अपने सभी मामलों में अधिक पारदर्शी होने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। साथ ही, निवेशकों का दबाव वित्तीय प्रतिफल की मांग बढ़ाएगा, जिससे दीर्घकालिक व्यावसायिक दांव लगाना कठिन हो जाएगा।

Exit mobile version