


नई दिल्ली. प्राइवेट स्कूलों की मनमानी फीस पर लगाम लगाने के लिए दिल्ली कैबिनेट ने गत 29 अप्रैल काे जिस फैसले को लिया था, उसे लागू करने के लिए सदन में आज विधेयक आ रहा है. मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा है कि फीस बढ़ोत्तरी को लेकर स्कूलों की मनमानी को नही चलने दिया जाएगा.
उन्होंने रविवार काे विधानसभा में कहा कि पूर्व की सरकार पिछले 10 साल में एक ऐसा कानून तक नहीं लेकर आई कि जिससे स्कूलों की मनमानी पर रोक लग पाती. कहा कि हमने अभिभावकों की परेशानी को समझा है अौर हम इसके लिए विधेयक लेकर आ रहे हैं. उन्होंने कहा कि इसी तरह दिल्ली सरकार के तहत पीडब्ल्यूडी के लिए हम अपना इंजीनियरिंग कैडर भी बनाने जा रहे हैं.
शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने कहा है कि अप्रैल में मुख्यमंत्री ने फीस वृद्धि को लेकर अभिभावकों की परेशानी सुनने के बाद स्कूलों को नोटिस भी जारी किया था. लेकिन, फीस वृद्धि के नियमन के लिए कानून की आवश्यकता थी. कैबिनेट ने इसके लिए दिल्ली स्कूल एजुकेशन ट्रांसप्रेंसी इन फिक्सेशन एंड रेगुलेशन ऑफ फीस-2025 को मंजूरी दी थी.
माना जा रहा है कि इससे 1677 स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों व उनके अभिभावकों को राहत मिलेगी. उन्होंने कहा कि इससे पहले किसी सरकार ने फीस वृद्धि को नियंत्रित करने पर ध्यान नहीं दिया. 1973 के एक्ट में स्कूलों की मनमानी रोकने का कोई प्रविधान नहीं था.
विधेयक में यह है खास : तीन वर्षों के लिए होगा समिति का निर्णय
तीन स्तरीय समिति बनाकर इस विधेयक को लागू किया जाएगा. पहले स्तर पर स्कूल स्तरीय 10 सदस्यीय फीस रेगुलेशन कमेटी बनेगी, जिसमें स्कूल प्रबंधन के साथ ही पांच अभिभावक भी शामिल होंगे. इसमें अनुसूचित जाति व महिलाएं भी अनिवार्य रूप से होंगी. स्कूल की इमारत व अन्य 18 बिंदुओं पर विचार करने के बाद फीस वृद्धि का निर्णय लेगी. 21 दिनों के अंदर अपनी रिपोर्ट देगी. समिति का निर्णय तीन वर्षों के लिए होगा.
जिला स्तरीय समिति डिप्टी डायरेक्टर एजुकेशन की अध्यक्षता में गठित होगी. यदि स्कूल स्तरीय समिति अपना निर्णय नहीं देगी तो जिला स्तरीय समिति इसे सुनेगी. यदि 45 दिनों में रिपोर्ट नहीं देगी तो राज्य स्तरीय समिति के पास जाएगी. राज्य स्तरीय समिति में सात सदस्य होंगे. यदि स्कूल स्तरीय समिति के निर्णय से स्कूल के 15 प्रतिशत अभिभावक सहमत नहीं हैं तो वह जिला स्तरीय समिति में अपील कर सकते हैं.
पहली बार उल्लंघन करने पर, स्कूलों पर 1 लाख रुपये से 5 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जाएगा, और बार-बार उल्लंघन करने पर 2 लाख रुपये से 10 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है.
यदि स्कूल निर्धारित समय के भीतर राशि वापस नहीं करता है, तो जुर्माना 20 दिनों के बाद दोगुना, 40 दिनों के बाद तिगुना और हर 20 दिनों की देरी के साथ बढ़ता रहेगा. बार-बार उल्लंघन करने पर स्कूल प्रबंधन में आधिकारिक पदों पर रहने पर प्रतिबंध लग सकता है और भविष्य में शुल्क संशोधन का प्रस्ताव देने का अधिकार भी छिन सकता है.



