

Jamshedpur. बागबेड़ा के बहुचर्चित नागाडीह हत्याकांड मामले में अदालत ने बुधवार को बड़ा फैसला सुनाया है। अपर जिला व सत्र न्यायाधीश विमलेश कुमार सहाय की अदालत ने इस मामले पांच अभियुक्तों को सजा के बिंदु पर फैसला सुनाते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है. साथ ही उनके ऊपर जुर्माना भी लगाया है. इससे पहले 25 सितंबर 2025 को अदालत ने इस मामले में पांच अभियुक्तों को दोषी करार दिया था. वहीं सबूतों के अभाव में 20 आरोपितों को बरी कर दिया था. बता दें कि इस मामले में 25 आरोपितों के विरुद्ध ट्रायल चल रहा था। इनमें चार को छोड़कर सभी आरोपित अदालत में उपस्थित हुए थे. अदालत ने इस मामले में अभियुक्तों को सजा सुनाई है उसमें गांव के मुखिया राजाराम हांसदा, रेंगो पूर्ति, गोपाल हांसदा, सुनील सरदार और तारा मंडल शामिल हैं.
हत्याकांड के आठ साल बीत चुके है. अदालत ने बुधवार को यह फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि भीड़ द्वारा कानून हाथ में लेने की प्रवृत्ति को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. यह घटना 18 मई 2017 की है, जब बच्चा चोरी की अफवाह के चलते नागाडीह गांव में चार निर्दोष युवकों को भीड़ ने पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया था. इस दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे राज्य को झकझोर कर रख दिया था.

20 आरोपियों को किया बरी, दो अब भी फरार
वहीं बरी होने वाले आरोपितों में जिपा हांसदा, गणेश मंडल, जवाहर लाल सरदार, गुलाम सरदार, लखन, बबलू पात्रो, अशोक पात्रो, परशुराम भूमिज, पेंटर, लेदरा मुर्मू, सुनील सरदार, सुरेंद्र, राजेश टुडू, शिबू करुवा, गोपाल टुडू, जगदीश सरदार, उमेश दास, डब्लू सवैया, लखन हांसदा, बाबू शामिल है. इसके अलावा एक आरोपित राहुल सरदार की मौत हो चुकी है। मामले में दो आरोपित जगत मार्डी और सुभाष आठ साल बाद भी फरार है.
जानें क्या है मामला
घटना की पृष्ठभूमि साल 2017 में राज्यभर में बच्चा चोरी की अफवाहें तेजी से फैल रही थीं। इसी बीच नागाडीह गांव में चार युवकों को बाहरी और संदिग्ध मानते हुए बच्चा चोर बता दिया गया. देखते ही देखते गांव की भीड़ इकट्ठा हो गई और चारों को घेरकर बुरी तरह पीटा गया। लाठी, डंडों और पत्थरों से हमला कर भीड़ ने चारों की मौके पर ही हत्या कर दी थी. आठ साल की लंबी कानूनी लड़ाई पुलिस ने इस मामले में 28 लोगों को नामजद किया था. विवेचना और गवाहों की गवाही के आधार पर अदालत ने पांच को दोषी पाया, जबकि शेष को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया. अदालत ने अपने फैसले में कहा कि भीड़ द्वारा कानून हाथ में लेना समाज के लिए अत्यंत खतरनाक संकेत है.



