
जमशेदपुर।
जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने 19 अगस्त को मानगो नगर निगम कार्यालय में अपर नगर आयुक्त और उप नगर आयुक्त के साथ बैठक की और उन दोनों अधिकारियों को उनके अधिकारों की ‘शिक्षा’ दी। विधायक ने कहा कि कार्यकारी अधिकार अपर नगर आयुक्त और उप नगर आयुक्त के पास है मेयर के पास यह अधिकार नहीं है।
इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए मानगो नगर निगम की मेयर श्रीमती सुधा गुप्ता ने कहा कि कार्यकारी अधिकार तो खुद विधायक सरयू राय के पास भी नहीं है। उन्हें यह अधिकार भी नहीं है कि वे नगर निगम के अधिकारियों को उनका अधिकार समझाने के लिए नगर निगम कार्यालय में बैठक करें। विधायक नगर निगम कार्यालय में यहां के पदाधिकारी के साथ बैठक अपने विधानसभा इलाके की समस्याओं के समाधान के बारे में और कार्यों की प्रगति के बारे में कर सकते हैं।
मेयर श्रीमती सुधा गुप्ता ने कहा कि कोई भी संस्थान बिना आपसी सहयोग के सफलतापूर्वक नहीं काम करता। मानगो की जनता के हित के लिए उन्होंने काफी कोशिशों के बाद मानगो नगर निगम में जनप्रतिनिधियों, पदाधिकारी और कर्मचारियों के बीच एकता और आपसी सकारात्मक सहयोग का वातावरण बनाया। परंतु ऐसा लगता है कि विधायक सरयू राय इस सकारात्मक वातावरण में दरार पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। जो जनता के हित में नहीं है। इससे जनता का विकास कार्य बाधित होगा।
संवैधानिक विवेचना करते हुए मानगो नगर निगम की मेयर सुधा गुप्ता ने कहा कि संविधान के तहत शासन के तीनों अंगों के काम अलग-अलग बांटे गए हैं। संविधान के मताबिक विधायक को मुख्यतः तीन तरह के अधिकार दिए गए हैं। पहला विधानसभा में कानून बनाना, प्रस्ताव लाना और वोट देना। राज्य के बजट पर चर्चा करना और उसे पास करना। प्रश्नों, प्रस्तावों और विधानसभा समितियों के ज़रिए मंत्रियों और सरकार से जवाब मांगना। यह कार्यपालिका पर निगरानी है, खुद कार्यकारी शक्ति का इस्तेमाल नहीं है। श्रीमती सुधा गुप्ता ने कहा कि एक विधायक को कार्यकारी शक्तियाँ तभी मिलती हैं जब वे राज्य सरकार की मंत्रिपरिषद (Cabinet/Council of Ministers) में मंत्री बनता है। मौजूदा स्थिति में विधायक सरयू राय को यह शक्ति नहीं मिली है। अनुच्छेद 163 और 164 के तहत विधायक मंत्री बनकर राज्य की कार्यपालिका का हिस्सा होते हैं। परंतु सरयू राय को यह अधिकार नहीं मिला है। मेयर सुधा गुप्ता ने कहा कि अक्सर भ्रम इसलिए होता है क्योंकि विधायकों को अपने क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए विधायक निधि (MLA Local Area Development Fund) मिलती है। लेकिन यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि विधायक खुद इस पैसे को सीधे खर्च या लागू नहीं कर सकते। विधायक केवल योजनाओं की सिफारिश करते हैं। उस पैसे को मंजूर करने, ठेका देने और काम पूरा करवाने की पूरी कार्यकारी जिम्मेदारी जिला प्रशासन और संबंधित विभागों की होती है। भारतीय संविधान के अनुसार विधायक का मुख्य काम “कानून बनाना और सरकार से सवाल पूछना” है, “प्रशासन चलाना या योजनाओं को लागू करना” नहीं है। श्रीमती सुधा गुप्ता ने कहा कि एक विधायक (MLA) नगर निगम के उच्चाधिकारियों के साथ नगर निगम कार्यालय में बैठक कर सकते हैं। लेकिन मेयर और विधायक दोनों की बैठकों के स्वरूप और अधिकारों में स्पष्ट अंतर होता है। मेयर नगर निगम का राजनीतिक और संवैधानिक प्रमुख होता है। मेयर नगर निगम के बोर्ड या सदन की औपचारिक बैठकों की अध्यक्षता करता है, जहाँ नीतियाँ बनाई जाती हैं और बजट पारित किया जाता है। इन बैठकों में निगम अधिकारियों का शामिल होना अनिवार्य होता है। दूसरी ओर, विधायक की बैठक मुख्य रूप से समीक्षा और समन्वय (Review and Coordination) के उद्देश्य से होती है। विधायक अपने क्षेत्र की जनसमस्याओं जैसे सड़क, पानी, सीवरेज और विधायक निधि (MLA Fund) के विकास कार्यों की समीक्षा के लिए नगर आयुक्त और अन्य अधिकारियों के साथ बैठक कर सकते हैं। विधायक के पास नगर निगम का सीधा प्रशासनिक नियंत्रण नहीं होता। वे अधिकारियों के साथ बैठक करके निर्देश या सुझाव दे सकते हैं और प्रगति रिपोर्ट ले सकते हैं, लेकिन निगम के बजट और प्रशासनिक प्रस्तावों को पारित करने का अंतिम अधिकार मेयर की अध्यक्षता वाले निगम सदन के पास ही रहता है। उन्होंने कहा कि मेयर जहाँ पूरे निगम का प्रशासनिक ढांचा और सदन चलाता है, वहीं विधायक अपने विधानसभा क्षेत्र की समस्याओं के समाधान और विकास कार्यों के समन्वय के लिए अधिकारियों के साथ बैठक करने का अधिकार रखता है, न कि नगर निगम के पदाधिकारी को उनका अधिकार समझने के लिए।
भारत की नगर निगम व्यवस्था (Municipal Governance) में शक्तियों का स्पष्ट विभाजन होता है।विधायी और राजनीतिक शक्तियाँ मेयर (Mayor) और नगर निगम के सदन (Council/Board) के पास होती हैं। मेयर अधिकारियों से विकास कार्यों की रिपोर्ट मांग सकता है, जनसमस्याओं पर स्पष्टीकरण ले सकता है और सदन के माध्यम से प्रशासन पर नियंत्रण रखता है। भारत की नगर निगम व्यवस्था (Municipal Governance) में शक्तियों का स्पष्ट विभाजन होता है:
कार्यकारी और प्रशासनिक शक्तियाँ: ये शक्तियाँ राज्य सरकार द्वारा नियुक्त नगर आयुक्त (Municipal Commissioner / IAS अधिकारी) के पास होती हैं। नगर निगम का पूरा प्रशासनिक अमला, बजट का निष्पादन, कर्मचारियों पर नियंत्रण, ठेके देना और जमीनी स्तर पर काम लागू करना नगर आयुक्त के अधीन होता है।
विधायी और राजनीतिक शक्तियाँ: ये शक्तियाँ मेयर (Mayor) और नगर निगम के सदन (Council/Board) के पास होती हैं।
कार्यकारी अधिकार विधायक सरयू राय के पास भी नहीं, नगर निगम में अनावश्यक हस्तक्षेप बर्दास्त नहीं अधिकारियों को दबाव में लाकर नहीं, कानून और निर्धारित प्रक्रिया से चलेगा मानगो नगर निगम
मेयर ने कहा कि विधायक द्वारा यह कहना कि कार्यकारी अधिकार अपर नगर आयुक्त एवं उप नगर आयुक्त के पास हैं, मेयर के पास नहीं, पूरी तस्वीर प्रस्तुत नहीं करता। नगर निकाय में निर्वाचित सदन तथा प्रशासनिक तंत्र की भूमिकाएं कानून और राज्य की नगर निकाय व्यवस्था से निर्धारित होती हैं। उसी प्रकार विधायक के पास भी नगर निगम का प्रत्यक्ष कार्यकारी या प्रशासनिक नियंत्रण नहीं होता।
उन्होंने कहा—
“विधायक अपने विधानसभा क्षेत्र की सड़क, पानी, सफाई, सीवरेज और अन्य जनसमस्याओं को लेकर अधिकारियों के साथ समीक्षा और समन्वय बैठक कर सकते हैं। लेकिन नगर निगम के अधिकारियों को यह बताने के नाम पर कि किस निर्वाचित पदाधिकारी के पास कितना अधिकार है, संस्थागत व्यवस्था में अनावश्यक हस्तक्षेप करना उचित नहीं है।”
विधायक का काम निगरानी और जनहित के मुद्दे उठाना, निगम प्रशासन चलाना नहीं
मेयर सुधा गुप्ता ने कहा कि संवैधानिक व्यवस्था में विधायिका और कार्यपालिका की भूमिकाएं अलग हैं। विधायक का प्रमुख दायित्व विधानसभा में कानून निर्माण, बजट पर चर्चा एवं मतदान तथा प्रश्नों, प्रस्तावों और समितियों के माध्यम से सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
उन्होंने कहा कि विधायक अपने क्षेत्र के विकास कार्यों की समीक्षा और योजनाओं की अनुशंसा कर सकते हैं, लेकिन योजनाओं का प्रशासनिक क्रियान्वयन संबंधित सरकारी विभागों और सक्षम अधिकारियों द्वारा किया जाता है।
“जिस प्रकार मेयर को अधिकारियों की वैधानिक प्रशासनिक शक्तियां अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है, उसी प्रकार विधायक को भी नगर निगम के प्रशासनिक तंत्र पर प्रत्यक्ष नियंत्रण का अधिकार नहीं है। हर निर्वाचित प्रतिनिधि और अधिकारी को अपने निर्धारित दायरे में रहकर जनता के लिए काम करना चाहिए।”
15 महीने तक नगर निगम खराब था, टेंडर के बाद अचानक सब ठीक कैसे हो गया?
मेयर सुधा गुप्ता ने विधायक सरयू राय की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि लगभग 15 महीनों तक नगर निगम की कार्यप्रणाली और अधिकारियों पर लगातार सवाल उठाए गए। अब जनता यह जानना चाहती है कि टेंडर से जुड़े निर्णयों के बाद अचानक परिस्थितियां कैसे बदल गईं?
उन्होंने कहा—
“15 महीने तक कहा गया कि नगर निगम बात नहीं सुनता, अधिकारी काम नहीं करते और पूरी व्यवस्था खराब है। फिर टेंडर प्रक्रिया के बाद अचानक सब कुछ ठीक कैसे दिखाई देने लगा? आखिर ऐसा क्या बदला? इसका जवाब मानगो की जनता को मिलना चाहिए।”
मेयर ने कहा कि यदि किसी टेंडर को लेकर आपत्ति है तो दस्तावेज सामने रखे जाएं। यदि किसी निर्णय में अनियमितता है तो उसकी विधिसम्मत जांच हो। लेकिन जनता के पैसे से जुड़े निर्णयों को किसी प्रकार के राजनीतिक दबाव से प्रभावित नहीं होने दिया जाएगा।
जिन टेंडरों पर सवाल उठे, उनकी जांच कराना मेरा दायित्व
सुधा गुप्ता ने कहा कि मेयर पद संभालने के बाद उन्होंने नगर निगम में वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही को प्राथमिकता दी। जिन टेंडरों, बिलों अथवा कार्यों की प्रक्रिया पर सवाल सामने आए, उनमें जांच और नियमानुसार कार्रवाई की बात कही गई।
उन्होंने आरोप लगाया कि अब कुछ पुराने कार्यों और ठेकेदारों को लेकर अधिकारियों पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है। मेयर ने कहा कि यदि किसी ठेकेदार या एजेंसी का काम पूरी तरह नियमसम्मत है तो उसे किसी राजनीतिक संरक्षण की आवश्यकता ही नहीं होनी चाहिए।
बोर्ड बैठक में सवाल क्यों नहीं उठाए गए?
मेयर ने सवाल किया कि यदि नगर निगम के अधिकारों और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर विधायक को इतनी गंभीर आपत्ति थी, तो संबंधित विषयों को निगम की बैठक और उपलब्ध संस्थागत मंचों पर स्पष्ट रूप से क्यों नहीं उठाया गया?
उन्होंने कहा—
“सवाल रिकॉर्ड पर रखिए, नियम बताइए, दस्तावेज मांगिए और जवाब लीजिए। लेकिन बैठक समाप्त होने के बाद अलग से अधिकारियों के पास जाकर उन्हें मेयर के अधिकार समझाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? जनता इस राजनीतिक सक्रियता के पीछे का उद्देश्य जानना चाहती है।”
अविश्वास प्रस्ताव और डिप्टी मेयर के अधिकार पर सार्वजनिक बहस की चुनौती
मेयर सुधा गुप्ता ने कहा कि नगर निगम से जुड़े अधिकारों पर बयान देते समय संबंधित राज्य कानून, नियमावली और वैधानिक प्रावधानों का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए।
उन्होंने विधायक को चुनौती देते हुए कहा कि यदि उनका दावा है कि पार्षद अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से मेयर को हटा सकते हैं, तो वे सार्वजनिक रूप से झारखंड में लागू संबंधित अधिनियम और उसकी धारा बताएं।
इसी प्रकार डिप्टी मेयर द्वारा बैठक की अध्यक्षता के संबंध में भी लागू कानून और परिस्थितियों को स्पष्ट किया जाए।
“राजनीति अपनी जगह है, लेकिन कानून पर बहस कानून की धाराओं और नियमों से होनी चाहिए। मैं भी नियम मानूंगी और विधायक जी से भी अपेक्षा है कि वे अपने दावों का वैधानिक आधार जनता के सामने रखें।”
नगर निगम 36 वार्डों की जनता का है, किसी राजनीतिक गुट की जागीर नहीं
मेयर ने कहा कि कुछ पार्षदों द्वारा लगातार हंगामा किए जाने से विकास कार्य प्रभावित होते हैं। हर पार्षद को सवाल पूछने और अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन सदन को राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का मंच नहीं बनाया जाना चाहिए।
“नगर निगम किसी विधायक, मेयर, पार्षद या राजनीतिक गुट की निजी जागीर नहीं है। यह 36 वार्डों की जनता की संस्था है। विकास कार्य सभी वार्डों में आवश्यकता और नियम के आधार पर होंगे, राजनीतिक पसंद-नापसंद के आधार पर नहीं।”
उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग निगम के फैसलों पर राजनीतिक प्रभाव स्थापित करना चाहते हैं, लेकिन उनके कार्यकाल में किसी भी प्रकार की कमीशनखोरी या नियम-विरुद्ध भुगतान को संरक्षण नहीं मिलेगा।
महिला हूं, लेकिन दबाव में झुकने वाली नहीं
मेयर सुधा गुप्ता ने कहा कि उनके महिला होने को कमजोरी समझने की भूल नहीं की जानी चाहिए।
“यदि किसी को लगता है कि महिला मेयर को दबाव, धमकी या राजनीतिक ताकत दिखाकर पीछे हटाया जा सकता है तो यह गलतफहमी है। मैं न डरूंगी, न झुकूंगी और न जनता के पैसे के साथ समझौता करूंगी।”
अधिकारियों को संदेश—किसी नेता से नहीं, कानून से डरिए
मेयर ने नगर निगम के अधिकारियों एवं कर्मचारियों से कहा कि वे किसी राजनीतिक दबाव में काम न करें और प्रत्येक निर्णय नियम एवं कानून के अनुसार लें।
“अधिकारी किसी नेता के नहीं, संस्था और कानून के प्रति जवाबदेह हैं। जो काम सही है, उसे निर्भीक होकर कीजिए। जहां गड़बड़ी है, वहां फाइल रोकिए, जांच कराइए और तथ्य रिकॉर्ड पर रखिए। ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारी और कर्मचारी के साथ मैं मजबूती से खड़ी रहूंगी।”
विकास में राजनीति नहीं होने दूंगी
मेयर सुधा गुप्ता ने कहा कि मानगो को वर्षों तक सड़क, जाम, पेयजल, ड्रेनेज और अन्य बुनियादी समस्याओं का सामना करना पड़ा है। अब जब महत्वपूर्ण विकास परियोजनाएं आगे बढ़ रही हैं, तब राजनीतिक विवाद पैदा करके विकास की गति रोकना जनता के हित में नहीं है।
उन्होंने कहा कि मानगो फ्लाईओवर सहित बड़ी परियोजनाओं को लेकर पूर्व में राजनीतिक मतभेद रहे हैं और अब जलापूर्ति समेत अन्य योजनाओं को भी तेजी से आगे बढ़ाने की जरूरत है।
“मानगो को राजनीति नहीं, परिणाम चाहिए। जनता को सड़क, नाली, पानी, सफाई और रोशनी चाहिए। विकास योजना चाहे केंद्र की हो, राज्य की हो, विधायक की पहल से आई हो या नगर निगम की—जनता के हित में होगी तो मैं उसका समर्थन करूंगी। लेकिन विकास के नाम पर अनियमितता होगी तो सवाल भी पूछूंगी।”
मेरे अधिकार क्षेत्र में राजनीतिक हस्तक्षेप स्वीकार नहीं
मेयर ने कहा कि विधायक सरयू राय जनसमस्याओं को लेकर नगर निगम आएं, अधिकारियों से समीक्षा करें और विकास कार्यों की प्रगति जानें—इस पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन निर्वाचित नगर निगम की संस्थागत व्यवस्था को कमजोर करने या अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच टकराव पैदा करने का प्रयास स्वीकार नहीं किया जाएगा।
अंत में मेयर सुधा गुप्ता ने कहा कि मानगो नगर निगम में अब टेंडर, वर्क ऑर्डर, बिल, भुगतान और विकास योजनाओं की प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना उनकी प्राथमिकता है।
उन्होंने कहा—
“अब किसी के कहने से फाइल नहीं चलेगी—नियम से चलेगी। किसी के दबाव में भुगतान नहीं होगा—दस्तावेज के आधार पर होगा। गलत काम की जांच होगी और सही काम को पूरी ताकत से आगे बढ़ाया जाएगा।”
