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झारखंड में भी आईएएस-आईपीएस सेवा के अधिकारियों को अब नेता बनना,भाने लगा

 

ये प्रशासनिक अधिकारियो को भी लोकतांत्रिक ताकतों का एहसास है,तभी तो ये अधिकारी नौकरी छोड़कर चुनाव लड़ने के लिए अलग-अलग राजनीतिक दलों के दामन थाम रहे हैं।

आईएसए-आईपीएस अधिकारियों के चुनावी राजनीति में
सक्रिय होने के बाद राज्य की राजनीति में क़यास लगाए जा रहे हैं कि अब अगला बारी किसका है?

आईपीएस अधिकारियों के अलावा भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों का राजनीतिक दलों में शामिल होने का सिलसिला भी जारी हो गया है।

झारखंड में सबसे पहले साल 2004 में डॉ रामेश्वर उरांव आईपीएस की नौकरी छोड़ लोहरदगा से कांग्रेस की टिकट से लोकसभा चुनाव जीते,परंतु 2009 में चुनाव हार गए। 2009 में ही कोडरमा लोकसभा से बसपा की टिकट पर आईएएस अधिकारी सभापति कुशवाहा चुनाव लड़े लेकिन हार गए। वही तेज तर्रार आईपीएस अधिकारी डॉ अजय कुमार 2010 में जमशेदपुर उपचुनाव झारखंड विकास मोर्चा के टिकट पर लड़े और चुनाव जीत गए। इसी तरह पूर्व डीजीपी आईपीएस बी डी  राम भाजपा के टिकट पर चुनाव मैदान में उत्तरे और जीते । पंजाब कैडर के आईपीएस अधिकारी अरुण उरांव ने भी नौकरी छोड़े राजनीति में प्रवेश कर गए हैं। अरुण उरांव के पिता बंदी उरांव भी आईपीएस की नौकरी छोड़ राजनीति में आए थे। आईएएस विनोद किस्टोपा स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर राजनीतिक दलो में शामिल हो गए हैं। चर्चित आईएएस अधिकारी मुख्तार सिंह एवं जेबी तुबिद भी भाजपा में शामिल हो गए हैं। आईएएस अधिकारी विमल कीर्ति सिंह की भी राजनीति मे आने को लेकर चर्चा है। वहीं पूर्व आईपीएस अधिकारी अमिताभ चौधरी नौकरी छोड़ बाबूलाल मरांडी के पार्टी झारखंड विकास मोर्चा में शामिल हुए थे । आईपीएस लक्ष्मण प्रसाद रिटायरमेंट के बाद राजनीतिक दलों के दामन थाम लिए हैं और कितने आने के लिए राजनीति में बेताब दिख रहे हैं।

आईएएस-आईपीएस को राजनीति में आने को लेकर कई लोगों का अपना अपना अलग विचार और मंतव्य है। कुछ लोगों का मानना है कि राजनीतिक दलों में नेतृत्व कमजोर होने के कारण आला अधिकारी पद और छवि के बूते पार्टियों में ऊंच जगह पा लेते हैं। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि नौकरशाही के राजनीति में बढ़ती दिलचस्पी भी आने का एक कारण हो सकता है। वही कुछ अधिकारी मौका देखकर यह राह चुन लेते हैं,और जनप्रतिनिधियों का विकल्प बन जाते हैं। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि रिटायरमेंट के बाद राजनीति में आना कुछ लोगों का सुनियोजित होता है। जबकि कुछ लोगों का मंतव्य है कि सरकारी सेवकों की राजनीति में प्रवेश, का मतलब है कि उन्हें भी लोकतांत्रिक ताकतों का एहसास है।
खैर जो भी हो लेकिन आज राजनीति में आईएएस आईपीएस के प्रवेश कहीं ना कहीं लोगों को बहुत कुछ संकेत कर रहे हैं।
ए के मिश्र

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