

New Delhi. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की जारी कवायद में बुधवार को हस्तक्षेप करने का आग्रह किया ताकि ‘लोकतंत्र की रक्षा की जा सके।’ उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य को निशाना बनाया जा रहा है और इसके लोगों के अधिकारों का हनन किया जा रहा है। ममता बनर्जी बुधवार को उच्चतम न्यायालय में बहस करने वाली पहली मौजूदा मुख्यमंत्री बन गईं। उच्चतम न्यायालय ने बनर्जी की याचिका और किसी सेवारत मुख्यमंत्री द्वारा उसके समक्ष प्रस्तुत दलीलों पर गौर किया और कहा, ‘‘पात्र व्यक्तियों को मतदाता सूची में शामिल होना चाहिए। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने उनकी याचिका पर निर्वाचन आयोग और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को नोटिस जारी कर नौ फरवरी तक जवाब मांगा है।
प्रधान न्यायाधीश ने निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि बूथ स्तर के अधिकारियों और मतदाता सूची अधिकारियों को नाम की वर्तनी में विसंगतियों जैसी छोटी-मोटी गलतियों के आधार पर नोटिस जारी करते समय अधिक संवेदनशील रहें। मुख्यमंत्री ने निर्वाचन आयोग को ‘व्हाट्सएप आयोग’ कहा, जो स्पष्ट रूप से निर्वाचन आयोग द्वारा निर्वाचन अधिकारियों को व्हाट्सएप पर कथित रूप से भेजे जा रहे निर्देशों की ओर इशारा था। बनर्जी सुबह लगभग 10 बजे अपने वकीलों के साथ उच्चतम न्यायालय परिसर पहुंचीं, जिनमें तृणमूल कांग्रेस के नेता एवं वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी भी शामिल थे। बनर्जी का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने किया। बनर्जी ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ से व्यक्तिगत रूप से अपनी दलीलें पेश करने की अनुमति मांगी।

शुरुआत में, बनर्जी ने पांच मिनट तक बहस करने की अनुमति मांगी। प्रधान न्यायाधीश ने जवाब में कहा कि अदालत उन्हें अपनी बात रखने के लिए पांच मिनट नहीं बल्कि 15 मिनट का समय देगी। बनर्जी ने कहा, ‘समस्या यह है कि हमारे वकीलों ने शुरू से ही हमारा पक्ष रखा, लेकिन सब कुछ खत्म होने के बाद भी हमें न्याय नहीं मिल रहा…। हमें कहीं भी न्याय नहीं मिल रहा। मैं एक बंधुआ मजदूर हूं, महोदय… मैं एक साधारण परिवार से हूं और मैं किसी पार्टी के लिए नहीं लड़ रही हूं।’’
बनर्जी ने आरोप लगाया, ‘‘पश्चिम बंगाल को निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने पूछा कि असम में यही मापदंड क्यों नहीं अपनाया जा रहा है। पीठ ने उनकी ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान के साथ-साथ खुद उन्हें (बनर्जी) भी दलील पेश करने की अनुमति दी थी। बनर्जी ने कहा, वे पश्चिम बंगाल को निशाना बनाकर वहां के लोगों के अधिकारों को कुचलने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा, हमें कहीं न्याय नहीं मिल रहा है। मैंने निर्वाचन आयोग को छह पत्र लिखे हैं। सुनवाई के अंत में, उन्होंने व्यक्तिगत रूप से बहस करने का मौका देने के लिए पीठ के प्रति आभार व्यक्त किया और उनसे ‘लोकतंत्र को बचाने’ का आग्रह किया।
बनर्जी ने राज्य में मतदाता सूची संबंधी एसआईआर को चुनौती दी है और निर्वाचन आयोग को यह निर्देश देने का अनुरोध किया है, ‘‘विशेष रूप से ‘तार्किक विसंगति’ के मामलों में, किसी अन्य दस्तावेज पर जोर दिए बिना, आधार कार्ड को पहचान के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाए। वर्ष 2002 की मतदाता सूची से संतानों के संबंध में तार्किक विसंगतियों में माता-पिता के नाम का मेल न होना और मतदाता तथा उनके माता-पिता की आयु में 15 वर्ष से कम या 50 वर्ष से अधिक का अंतर होना शामिल है।
बनर्जी की ओर से पेश हुए दीवान ने बड़ी संख्या में ‘अनमैप्ड’ मतदाताओं का हवाला दिया और कहा कि सुधारात्मक उपायों के लिए अब शायद ही समय बचा है क्योंकि यह प्रक्रिया 14 फरवरी को समाप्त होने वाली है।
उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग को ‘तार्किक विसंगति’ सूची में नामों का उल्लेख करने के कारणों को अपलोड करना होगा। उन्होंने कहा कि अब तक 1.36 करोड़ लोगों को तार्किक विसंगतियों के उल्लंघन के लिए नोटिस जारी किये जा चुके हैं।
बनर्जी ने दावा किया कि जारी एसआईआर प्रक्रिया के दौरान निर्वाचन आयोग द्वारा कई जीवित व्यक्तियों को मृत घोषित कर दिया गया है। उन्होंने कहा, ‘‘उनकी एसआईआर प्रक्रिया केवल नाम हटाने के लिए है, शामिल करने के लिए नहीं।’’ इस प्रक्रिया के कारण नागरिकों को हो रही कठिनाइयों को उजागर किया और कहा कि उन्हें इस बात की राहत है कि अदालत ने पहले ही इस प्रक्रिया में आधार कार्ड को एक दस्तावेज के रूप में शामिल करने का निर्देश दिया था।
बनर्जी ने आरोप लगाया कि उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बावजूद, निर्वाचन आयोग आधार कार्ड स्वीकार नहीं कर रहा है और मतदाता सूची पुनरीक्षण के लिए मतदाताओं से अन्य दस्तावेज मांग रहा है। उन्होंने पूछा, अन्य राज्यों में निवास प्रमाण पत्र, परिवार पंजीकरण कार्ड आदि जैसे दस्तावेज मान्य हैं…। वे चुनाव के समय केवल बंगाल को ही निशाना बना रहे हैं। इतनी जल्दी क्या थी?बनर्जी ने कहा कि यह प्रक्रिया, जिसमें आमतौर पर दो साल लगते हैं, राज्य में त्योहारों और फसल कटाई के मौसम के दौरान भी तीन महीने की छोटी अवधि में पूरी की जा रही है। मुख्यमंत्री ने एसआईआर कवायद में शामिल अधिकारियों की मौत का मुद्दा उठाया।
निर्वाचन आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने आरोपों का खंडन करते हुए दावा किया कि राज्य सरकार ने एसआईआर प्रक्रिया की निगरानी के लिए उपजिलाधिकारी जैसे द्वितीय श्रेणी (ग्रेड-2) के केवल 80 अधिकारियों की सेवाएं प्रदान की हैं।बनर्जी ने निर्वाचन आयोग के आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि राज्य ने निर्वाचन आयोग द्वारा मांगी गई हर चीज उपलब्ध कराई है।
जब निर्वाचन आयोग की ओर से पेश वकील ने बीच में दखल दिया, तो बनर्जी ने हाथ जोड़कर कहा, ‘‘कृपया मुझे बोलने की अनुमति दें महोदय! उन्होंने इस बात पर ध्यान दिलाया कि विवाहित महिलाओं को अपने ससुराल में रहने या अपने पति का उपनाम इस्तेमाल करने पर नोटिस भेजा जा रहा है।
जब निर्वाचन आयोग के वकील ने उनकी दलीलों पर आपत्ति जताई, तो प्रधान न्यायाधीश कांत ने बीच में ही टोकते हुए कहा, ‘‘मैडम बोलने के लिए इतनी दूर तक आई हैं।’’ सुनवाई के दौरान, पीठ ने टिप्पणी की कि ‘‘पात्र व्यक्तियों को मतदाता सूची में बने रहना चाहिए’’। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि हर समस्या का समाधान होता है और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कोई भी निर्दोष व्यक्ति इससे वंचित न रह जाए। प्रधान न्यायाधीश ने बंगाली बोली का जिक्र करते हुए कहा कि कभी-कभी इसकी वजह से अंग्रेजी में नामों की वर्तनी गलत हो जाती है।



