New Delhi. सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट तक पहुंच और इसके इस्तेमाल के अधिकार को बच्चों का मौलिक अधिकार घोषित करते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह डिजिटल मंच पर बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री का पता लगाने और उसे हटाने के लिए एक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करे। शीर्ष अदालत ने गैर सरकारी संगठन ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन एलायंस’ की याचिका पर यह आदेश पारित किया। याचिका में सोशल मीडिया पर बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री के खतरनाक स्तर तक बढ़ने की ओर ध्यान दिलाया गया था। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने अदालत के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि इंटरनेट निस्संदेह विचारों, रचनात्मक अभिव्यक्ति और सूचनाओं का एक बाज़ार है, तथा इसका महत्व अमूल्य है-सिर्फ इसलिए नहीं कि इसमें ढेर सारी जानकारी मौजूद है, बल्कि इसलिए भी कि यह बड़ों और बच्चों, दोनों को ही जानकारी तक पहुँचने का मौका देता है।

पीठ ने 15 अक्टूबर को 137 पृष्ठ के फैसले में कहा, ‘‘उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखते हुए, हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि इंटरनेट तक पहुँचने और उसका उपयोग करने का अधिकार, संविधान के अनुच्छेद 21 एवं अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत प्रत्येक व्यक्ति का एक मौलिक अधिकार है।

इसने कहा, ‘हमारे बच्चों को, चाहे उनकी उम्र कुछ भी हो, समान अधिकार प्राप्त हैं। इन अधिकारों से पूरी तरह वंचित करना उतना ही बेतुका होगा, जितना यह कहना कि एक निश्चित उम्र से कम के बच्चों के पास न तो कोई ऐसी अंतरात्मा है जिसकी रक्षा की जानी चाहिए, और न ही अभिव्यक्ति की ऐसी स्वतंत्रता है जिसे व्यक्त किया जाना चाहिए। वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फुलका ने संबंधित गैर सरकार संगठन का प्रतिनिधित्व किया। न्यायालय ने कहा कि उसकी टिप्पणी का यह मतलब नहीं है कि उम्र के आधार पर कोई पाबंदी नहीं होनी चाहिए।

