


Ranchi. झारखंड हाइकोर्ट ने राज्य में हिरासत में हुई मौतों पर चिंता व्यक्त करते हुए बृहस्पतिवार को कहा कि सरकार ने इन घटनाओं की जांच से संबंधित अनिवार्य कानूनी प्रावधानों का व्यवस्थित रूप से उल्लंघन किया है और वह ‘प्रणालीगत गैर-अनुपालन की इस बेहद दुखद तस्वीर’ को देखकर ‘स्तब्ध’ है। अदालत ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए इस तथ्य पर संज्ञान लिया कि 2018 और 2025 के बीच झारखंड में हिरासत में हुई 427 मौतों में से, कार्यकारी मजिस्ट्रेटों ने 262 मामलों की जांच की, जबकि दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अनुसार यह जांच न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा की जानी चाहिए। न्यायमूर्ति एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की पीठ ने कहा, ‘राज्य द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों का अवलोकन करने पर, और यह मानते हुए कि यह पूरी और सही स्थिति को दर्शाता है, यह न्यायालय अत्यंत स्तब्ध है।’
अदालत ने टिप्पणी की, ‘‘यद्यपि प्रतिवादियों का दावा है कि सभी 427 मामलों में मजिस्ट्रेट द्वारा जांच की गई थी, लेकिन उनके अपने आंकड़े कानून की मूलभूत भ्रम या पूर्ण अवहेलना को दर्शाते हैं… उनकी स्वयं की स्वीकारोक्ति के अनुसार, 262 मामलों की जांच कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा की गईं, जबकि कानून ने स्पष्ट रूप से दो दशक पहले कार्यपालिका से यह विशेषाधिकार छीन लिया था।
पीठ ने इस स्थिति को ‘‘प्रणालीगत गैर-अनुपालन की एक बेहद दुखद और चौंकाने वाली तस्वीर’ करार दिया। अदालत ने कहा कि राज्य का आचरण हिरासत में हुई मौतों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए संसद द्वारा विशेष रूप से अधिनियमित प्रक्रियाओं का पालन करने में ‘‘पूर्ण विफलता’’ को दर्शाता है।



