Jamshedpur. एनएच-33 टाटा-रांची हाइवे पर चौका थाना क्षेत्र के चावलीबासा के पास शुक्रवार को पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के काफिले में शामिल पुलिस की टाटा सूमो उनकी गाड़ी से पीछे से टकरा गयी. हादसे में पूर्व मुख्यमंत्री समेत किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है. जानकारी के अनुसार पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा रांची से जमशेदपुर लौट रहे थे. इसी दौरान चावलीबासा के पास एक स्विफ्ट डिजायर कार अचानक उनके काफिले के बीच घुस गयी. कार के अचानक सामने आने से अर्जुन मुंडा की गाड़ी के चालक ने जोरदार ब्रेक लगा दिया. इसी दौरान पीछे से आ रही पुलिस की टाटा सूमो अनियंत्रित होकर उनकी गाड़ी से टकरा गयी. टक्कर इतनी जोरदार थी कि पूर्व मुख्यमंत्री की गाड़ी का पिछला हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया, जबकि पुलिस की टाटा सूमो का आगे का बायां पहिया पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया. हादसे के बाद घटनास्थल पर कुछ देर के लिए अफरातफरी मच गयी.


सुरक्षा काफिले में जर्जर वाहन पर सवाल
अर्जुन मुंडा ने सोशल मीडिया पर लिखा, खूंटी से जमशेदपुर जाने के क्रम में एनएच-33 स्थित चौका के समीप मेरे सुरक्षा काफिले (कारकेड) में शामिल एक वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो गया। ईश्वर का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं कि इस दुर्घटना में मुझे और मेरी सुरक्षा में तैनात किसी भी जवान को कोई क्षति नहीं पहुंची। लेकिन अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक विषय है कि राज्य सरकार द्वारा सुरक्षा व्यवस्था के लिए उपलब्ध कराए जा रहे वाहनों की स्थिति बेहद खराब है। यह केवल मेरी सुरक्षा का विषय नहीं, बल्कि दिन-रात अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने वाले सुरक्षाकर्मियों के जीवन से भी जुड़ा गंभीर मामला है। मेरे कार्यालय द्वारा इस संबंध में बार-बार संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखकर वाहनों की जर्जर स्थिति, बार-बार उत्पन्न होने वाली तकनीकी खराबियों तथा सुरक्षा पर पड़ रहे प्रभाव से अवगत कराया गया है।

इसके अतिरिक्त, गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा भी दिनांक 14.03.2026 को पत्रांक 08/सुरक्षा(II)-01/2025, ज्ञापांक 1645 के माध्यम से आवश्यक कार्रवाई हेतु पत्र जारी किया गया था। इसके बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ है। केवल सामान्य मरम्मत कर वाहनों को पुनः भेज दिया जाता है और कुछ ही समय बाद वही तकनीकी समस्याएं फिर सामने आने लगती हैं। साथ ही आज तक सुरक्षा हेतु कोई भी समीक्षा भी विभाग के द्वारा नहीं की गयी, जो घोर लापरवाही है।
हैरानी की बात है कि अत्यंत पुराने और जर्जर वाहन भी सुरक्षा काफिले में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। वाहनों पर सायरन और झंडे जैसी पहचान की व्यवस्था नहीं होने से अन्य वाहन चालकों को सुरक्षा काफिले का पता नहीं चल पाता और कई बार दूसरी गाड़ियां कारकेड के बीच में घुस जाती हैं। इससे सुरक्षा व्यवस्था और भी प्रभावित होती है। शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता हो, जब इन वाहनों में कोई तकनीकी समस्या सामने न आती हो। सवाल यह है कि क्या किसी बड़ी दुर्घटना या जनहानि के बाद ही जिम्मेदार अधिकारियों की नींद खुलेगी? सुरक्षा व्यवस्था केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि जीवन की रक्षा से जुड़ी गंभीर जिम्मेदारी है। सरकार को इस विषय पर तत्काल संज्ञान लेते हुए सुरक्षा काफिले में निर्धारित मानकों के अनुरूप सुरक्षित और तकनीकी रूप से दुरुस्त वाहन उपलब्ध कराने चाहिए।

