


जमशेदपुर में 11 साल पुराने बहुचर्चित उपायुक्त (डीसी) कार्यालय हंगामा मामले में अदालत ने अहम फैसला सुनाते हुए पूर्व जिला पार्षद किशोर यादव समेत पांच आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया। मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (सीजेएम) की अदालत ने यह निर्णय साक्ष्यों के अभाव और अभियोजन पक्ष की कमजोरी के आधार पर दिया।
क्या था पूरा मामला?
यह घटना 4 जनवरी 2013 की है, जब स्थानीय समस्याओं और जनहित के मुद्दों को लेकर बड़ी संख्या में लोग उपायुक्त कार्यालय परिसर में जुटे थे। प्रदर्शन धीरे-धीरे उग्र हो गया और प्रशासनिक कार्य बाधित होने लगे। हालात बिगड़ने के बाद पुलिस ने मामले को संज्ञान में लिया और कार्रवाई शुरू की।
एफआईआर कैसे दर्ज हुई?
घटना के बाद उपायुक्त कार्यालय में कार्यरत लिपिक अलखेन खलको ने शिकायत दर्ज कराई थी। इस शिकायत के आधार पर बिष्टुपुर थाने में भारतीय दंड संहिता की धाराओं 142, 149, 341 और 504 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई। इस केस में किशोर यादव के अलावा राहुल सिंह, धनंजय सिंह, डी.एन. सिंह और आर.बी. सरन को नामजद आरोपी बनाया गया था।
अदालत में क्या हुआ?
पिछले 11 वर्षों से यह मामला अदालत में लंबित था। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने तीन गवाह पेश किए, लेकिन उनकी गवाही स्पष्ट और मजबूत नहीं रही। जिरह के दौरान कई विरोधाभास सामने आए, जिससे केस कमजोर पड़ गया।
बचाव पक्ष की मजबूत दलील
बचाव पक्ष के वकीलों ने अदालत में जोरदार बहस की। अधिवक्ताओं ने गवाहों के बयानों में खामियां उजागर करते हुए यह साबित करने की कोशिश की कि आरोपियों की घटना में सीधी भूमिका नहीं थी। उनकी दलीलों ने केस का रुख बदलने में अहम भूमिका निभाई।
कोर्ट का फैसला
सभी पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने पाया कि आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त और ठोस साक्ष्य नहीं हैं। इसी आधार पर पांचों आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।
फैसले के बाद माहौल
फैसले के बाद आरोपियों और उनके समर्थकों में खुशी का माहौल देखा गया। लंबे समय तक चली कानूनी लड़ाई के बाद उन्हें बड़ी राहत मिली है।



