


- टाटानगर में कॉमर्शियल के दो कर्मचारियों की गिरफ्तारी पर सीनियर डीसीएम के मौन से बढ़ रहा है आक्रोश
- जब माल की कस्टडी कॉमर्शियल क्लर्क के पास नहीं तो आरपीएफ ने कैसे माना इसे ”क्रिमिनल मिसप्रोपेएिशन”
- आरपीएफ की जांच और कारवाई पर उठाये जा रहे सवाल, गिरफ्तारी के पीछे भारी दबाव और बड़े गोलमाल के संकेत
जमशेदपुर. टाटानगर रेलवे यार्ड में 24 लाख की एक साल पुराने चोरी के मामले में आरपीएफ ने दो रेलकर्मियों को जेल भेजकर भले ही अपनी पीठ थपथपाने का प्रयास किया है लेकिन इस कार्रवाई ने रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था व विभागीय जांच प्रक्रिया की पोल खोलने के साथ ही एक नये विवाद को जन्म दे दिया है. बड़ा सवाल यह उठाया जा रहा है कि एक वैगन से चावल के लगभग 1259 बोरियों की निकासी क्या बिना आरपीएफ के मिलीभगत के संभव हो सकती है? क्या जांच कार्रवाई के दायरे से आरपीएफ ने अपनी एजेंसी को अलग कर लिया था ? क्या अनलोडिंग से लेकर परिवहन और बाजार में चावल को खपाने तक आरपीएफ की सुरक्षा एजेंसियां सो रही थी? अगर यह चावल एफसीआई में उतारा गया तो उसके लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं की गयी? ऐसे में सवाल यह उठाये जा रहे है कि क्या आरपीएफ ने इस मामले में गुड्स क्लर्कों को बली का बकरा बना दिया है?
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टाटानगर रेलवे यार्ड अथवा एफसीआई में आये वैगन से 1259 बोरों की चोरी का यह मामला जिनता चिंतनीय है उतनी ही इसकी जांच व कार्रवाई ने उसे दिलचस्प बना दिया है. इस मामले में आरपीएफ ने गुडस क्लर्कों के अलावा सीजीएस यानी मुख्य गुर्ड्स सुपरवाइजर, ऑपरेटिंग के कुछ लोगों के अलावा एफसीआई तक दायरा बढ़ाकर जांच को अंजाम तक पहुंचाने का प्रयास किया है. आरपीएफ ने चोरी गये चावल को रेलवे की संपत्ति बताया है. तब यह सवाल भी उठ रहा है कि अगर चोरी रेलवे क्षेत्र में हुई और यह रेल संपत्ति थी तो उसकी निगरानी और सुरक्षा की जिम्मेदारी से आरपीएफ कैसे पल्ला झाड़ सकती है?
एक साल पुराने मामले में गुड्स क्लर्क सूरज और मुकेश का दोष क्या
रेलवे वैगन से 24 लाख रुपये के चावल गायब होने का यह मामला एक साल से अधिक पुराना है. इस मामले में रेल सुरक्षा बल (आरपीएफ) ने टाटानगर गुड्स शेड के कमर्शियल क्लर्क सूरज कुमार और मुकेश कुमार को पहले नोटिस देकर जांच के लिए बुलाया और मंगलवार को दोनों को जेल भेज दिया. हालांकि इस मामले में अब तक यह साफ नहीं हो सका है कि आखिर चावल की चोरी कहां से हुई. आरपीएफ ने अपनी रिपोर्ट में इसे क्रिमिनल मिसप्रोपिएशन बताया है.अब सवाल यह उठाया जा रहा है कि जब वेगन और चावल की कस्टडी ही कॉमर्शियल क्लर्क के पास नहीं थी तो आरपीएफ ने उन पर यह आरोप कैसे तय कर दिया ?
क्या था मामला, आखिर कहां गया 1259 बोरी चावल, एफसीआई भी मौन
12 मार्च 2024 को ओडिशा के कांताबांजी से पश्चिम बंगाल के कृष्णानगर के लिए मालगाड़ी वैगन से चावल चला था. इसमें एक वैगन सीक होने के कारण अलग कर दिया गया था जो बाद में एफसीआई टाटा के 40 बोगियों वाले दूसरे रैक के साथ जोड़कर टाटानगर भेजा गया. इस वैगन को किसी मालगाड़ी से कृष्णानगर भेजा जाना था. लेकिन दो दिन तक टाटानगर यार्ड में मालगाड़ी खड़ी रहने के बाद पूरा रैक एफसीआई साइडिंग में प्लेस हो गया. तब तक किसी को गड़बड़ी का पता नहीं चला. बाद में कृष्णानगर एफसीआई ने एक वैगन चावल कम होने की रिपोर्ट दर्ज करायी. यह मामला तब जून 2024 में यहां पहुंचा. एक साल तक मामले में कछुए की रफ्तार से जांच चलती रही. इसमें एफसीआई ने साफ किया कि उसके 40 वैगन के बाद जो एक वैगन आया था वह खाली था. इस तरह एफसीआई ने माल अपने यहां अनलोड होने की बात से इंकार कर दिया और यह मामला टाटानगर रेलवे यार्ड में दो दिनों तक मालगाड़ी खड़ी रहने के बीच आकर उलझ गया.
यार्ड में मालगाड़ी वैगन से 1259 बोरा चावल उतारा जाना संभव नहीं…
रेलवे के जानकारों का कहना है कि चावल लोड मालगाड़ी यार्ड में दो दिन थी. इस बीच रैक एफसीआई में प्लेस हुआ. एफसीआई ने अपनी आपूर्ति में कोई कमी नहीं होने की बात कही. तब सवाल उठ रहा है कि आखिर 41 वैगन वाली मालगाड़ी के एकमात्र वैगन से 1259 बोरा चावल कहां गया? क्या रेलवे में यार्ड में इसे उतारा जाना संभव है? इसका जबाव भी रेलवे अधिकारी देते कि यह किसी भी तरह संभव नहीं है. इसका मतलब साफ है कि चावल या तो एफसीआई में उतारा गया या यह माल टाटानगर आने से पहले ही उतारा जा चुका था जो यार्ड में मालगाड़ी आने के बाद जांच नहीं होने के कारण यह चोरी टाटानगर के मत्थे मढ दी गयी. दिलचस्प यह कि सही समय और स्पष्ट जांच नहीं होने के कारण ही यह मामला टाटानगर आरपीएफ के गले की हड्डी बन गया है. आरपीएफ के सेवानिवृत्त अधिकारी भी यह मानते है कि भारी दबाव के बीच आरपीएफ की यह कारवाई दोषपूर्ण है, रेलवे क्लर्क लापरवाही के दोषी हो सकते है लेकिर चोरी के आरोपी नहीं !



