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    Home»Breaking News»Dhanbad News :असीमित बोरिंग से हुआ जल का भीषण संकटः सरयू राय
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    Dhanbad News :असीमित बोरिंग से हुआ जल का भीषण संकटः सरयू राय

    धनबाद, रांची और जमशेदपुर में रिवर बेड के अंदर लोगो ने घर बना लिया
    News DeskBy News DeskMarch 22, 2026
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    धनबाद। जमशेदपुर पश्चिम के विधायक और दामोदर बचाओ आंदोलन के प्रणेता सरयू राय ने कहा है कि नदियों पर किया गया अतिक्रमण विनाश को आमंत्रित कर रहा है। केवल रिवर बेसिन नहीं बल्कि रिवर बेड में भी अतिक्रमण हुआ है। रांची और जमशेदपुर में स्वर्णरेखा के बेड के अंदर लोगों ने घर बना लिया है। बाढ़ आने से उनके घर का नुकसान होता है। अतिक्रमित ज़मीन को मुक्त करने से नदियां अविरल बहेंगी। वह जल दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित दो दिवसीय नेशनल कांफ्रेंस के पहले दिन बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। इस कार्यक्रम का आयोजन आईआईटी (आईएसएम) धनबाद, स्वयंसेवी संस्था युगांतर भारती, नमामि गंगे, केंद्रीय भूमि जल बोर्ड, सीएसआईआर, लाइफ और मिशनY ने किया था। यह कार्यक्रम पेनमैन ऑडिटोरियम, आईआईटी (आईएसएम), धनबाद में आयोजित हुआ। इसमें देश भर के पर्यावरणविद और पर्यावरणप्रेमी भाग ले रहे हैं।
    मिशनY: नदी का भूमि अधिग्रहण विषय पर बोलते हुए सरयू राय ने कहा कि असीमित बोरिंग से जल का भीषण संकट उत्पन्न हो गया है। हमारे उद्योग भस्मासुर हो गए हैं। डीवीसी एक्ट में लिखा है कि दामोदर के जल को प्रदूषित करने वालों पर कड़ी करवाई होगी। शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण नदियां विलुप्त हो रही हैं। अब शहरीकरण के पहले शासन प्रशासन को सोचना होगा कि योजनाओं का क्रियान्वयन कैसे किया जाए।

    उन्होंने कहा कि नदियां अपना रास्ता ख़ुद बनाती है। यह एक प्राकृतिक धारा होती है। जल में इतनी शक्ति है कि वो पहाड़ को तोड़ कर अपना रास्ता बना सकता है। अगर हम एक विकल्प जल के प्रवाह का समाप्त करेंगे तो वो दूसरा रास्ता खोजेगा। यह प्रकृति के लिए विनाशकारी साबित होगा। उन्होंने सोन रिवर कमीशन, 1982 का हवाला देते हुए कहा कि जैसे-जैसे नदी बह रही है, वहां जल के हितों को ध्यान में रख कर नदी के किनारे विकास किया जाएगा। बाद में 1986 में इस कमीशन को बंद कर दिया गया। धारणा यह बनी कि नदी और औद्योगिक विकास एक-दूसरे के पूरक हैं। आज जो हो रहा है, उसे देख कर सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि हो क्या रहा है।

    श्री राय ने कहा कि सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल में आज की चुनौतियों का समाधान तो है, पर नीतिकार अव्यवस्था का शिकार बन जाते हैं। नौजवान अधिकारी अच्छा काम करते है, लेकिन जैसे जैसे वो ऊपर जाते हैं, वैसे-वैसे वो भी उसी व्यवस्था का अंग बन जाते हैं और मूल्यों से समझौता कर लेते हैं। सरकार कोई भी आए, हम मूल नीतियों में निरंतरता क़ायम करें, हमें ऐसा प्रयास करना चाहिए। डैम के नीचे जाने पर आप देखेंगे की नदियां मर गई हैं। अहमदाबाद में रिवर मैनेजमेंट किया गया है। नदी को बांध दिया गया है। साबरमती को शहर के लोगों ने मनोरंजन का साधन बना दिया है। अब जरूरत है कि हम लोग अपनी सोच को बदलें। अन्यथा नदी को माता का दर्जा देने की जरूरत ही क्या? हमें होलेस्टिक एप्रोच से पर्यावरण को बचाने पर पहल करनी होगी।

    मुख्यवक्ता के रुप में डॉल्फिन मैन के नाम से प्रसिद्ध श्री माता वैष्णो वैष्णो देवी विश्वविद्यालय एवं नालंदा ओपन विश्वविद्यालय के पूर्व वीसी और पद्मश्री प्रो. आर के सिन्हा ने कहा कि 1950 के दशक में करीब 150 किमी इलाके में तटबंध का कार्य किया गया। आज गंगा में सिर्फ सैकड़ों किमी तक तटबंध कर दिया गया है। पहले तटबंध इसलिए किया जाता था ताकि बाढ़ न आए। आज तटबंध औद्योगिक विकास के कारण बनाये जा रहे हैं। पहले बाढ़ का पानी तीन-चार दिनों में निकल जाता था। अब चीजें बहुत हद तक बदल चुकी हैं। गंगा में मछलियों की प्रजातियां तेजी से विलुप्त हो रही हैं। हरिद्वार कुंभ में अमेरिकन महिला स्नान करने के बाद से वायरल इन्फेक्शन की जद में आईं और बाद में उनकी मृत्यु हो गई। गंगा में अब खतरनाक बैक्टीरिया और वायरस आ गए हैं।

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    इसके पूर्व उद्घाटन भाषण में मिशनY के संयोजक सह प्राध्यापक, पर्यावरण विज्ञान विभाग, आईआईटी (आईएसएम) प्रोफेसर अंशुमाली ने कहा कि वाटरशेड के नाम पर बहुत सारी स्कीमें चलती हैं लेकिन उनको पुनर्जीवित करने के लिए कुछ खास नहीं किया गया है। गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने के बाद काम तो बहुत हुआ पर हमारे पास कोई बेस लाइन डेटा नहीं है। इसलिए नदियों के विलुप्त होने पर बात नहीं हो पाती। अब तो छोटी नदियों का अस्तित्व खतरे में है। भारत में हमने कई क्षेत्रों में वर्ल्ड हेरिटेज साईट घोषित किया है लेकिन वहां की नदियों का हालत दयनीय हो चली है। नदियों को अतिक्रमण से बचाना होगा और अतिक्रमित भूमि को नदी को वापस देने से ही प्रकृति बच पाएगी।

    बतौर विशिष्ट अतिथि युगांतर भारती के अध्यक्ष अंशुल शरण ने कहा कि बढ़ते जल संकट, भूगर्भ जल का अविवेकपूर्ण दोहन, जलवायु परिवर्तन तथा अनियंत्रित भूमि उपयोग के कारण भारत की नदियां एवं भूजल संसाधन गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं। भारत के कई राज्यों में क्लाईमेट चेंज के कारण अनियमित मॉनसून, बाढ़ और सूखा का प्रभाव देखा जा रहा है। नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में भी कमी आई है। कृषि भूमि का तेजी से शहरीकरण एवं औद्योगिकीकरण होने से खाद्यान्न संकट बढ़ने का खतरा उत्पन्न हो गया है। 2030 तक पेयजल की जितनी डिमाण्ड है, सप्लाई उससे कम रह जाएगी। अंधाधुंध जंगलों की कटाई, केचमेंट एरिया पर अतिक्रमण के कारण गंगा, दामोदर जैसी बड़ी नदियों की सहायक छोटी नदियां, छोटी जल धाराओं का अस्तित्व समाप्त होने का खतरा बढ़ गया है। जल संसाधनों के समुचित प्रबंधन, संरक्षण और न्यायसंगत वितरण के लिए नेशनल वाटर पॉलिसी में संशोधन अनिवार्य प्रतीत हो रहा है। कृषि भूमि संरक्षण हेतु उपजाऊ भूमि के गैर कृषि भूमि उपयोग पर नियंत्रण तथा फूड सिक्योरिटी जोन का निर्माण आवश्यक है। जलवायु परिवर्तन को पर्यावरणीय नीति का मुख्य धूरी बनाना होगा।

    सेमिनार में पीटीआर के उप निदेशक प्रजेश जेना, बीएचयू के पर्यावरण विभाग के प्राध्यापक डा. राजीव प्रताप सिंह, आईसीएफआर के वैज्ञानिक डा. शरद तिवारी, भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के पूर्व क्षेत्रीय प्रभारी डा. गोपाल शर्मा, पूर्व आईपीएस अधिकारी संजय रंजन सिंह ने भी अपने विचार रखे।

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    इनके इलावा डा. अमित बेरा, रोजा एलिज़ा, कौशिक बनर्जी, उपरना चटर्जी, लता खत्री, परिसीमा बोरा, प्रांजल यादव, राहुल पांडेय, रोहित शर्मा, विवेक शाहजी, मनसा उत्तसिन्नी, रेणु और सूबादीप सरकार ने विभिन्न विषयों पर पेपर प्रेजेंटेशन किया।

    सेमिनार में सोमवार को क्या होगा
    सोमवार को कार्यक्रम के मुख्य वक्ता होंगे जल पुरुष के नाम से प्रसिद्ध, मैगसेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह, नोर्मी के प्रो. गुरदीप सिंह, प्रो बी.के. सिंह का व्याख्यान एवं कई अन्य विद्वानों का पेपर प्रेजेंटेशन होगा।

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